ओ जीरो जीवरो बैरी रे, मत ब्यावो म्हारा परनिया जीरो,बारिश बन जाती है फसलों की बैरन

Mar 20,2018, 00:03 AM

जालोर ब्यूरो चीफ / कृष्णा देवासी पांथेड़ी 

जालोर / पश्चिमी राजस्थान में फसल कटाई के दौरान गीत गाये जाते है जिन्हें लाह कहते है। इन दिनों जालोर जिले में जीरा और इसबगोल फसल की कटाई हो रही है। बरसात के डर से किसान समयपूर्व लाह लेकर फसल काट रहे है।जालोर जिले के कई क्षेत्रों मे  मौसम के बदलने के साथ ही क्षेत्र के किसानों ने खेतों में खड़ी जीरे और इसबगोल की फसलों की समयपूर्व ही कटाई शुरू कर दी है। दरअसल ये क्षेत्र इन फसलों की बुआई में अव्वल है और खेतों में खड़ी फसल पककर तैयार भी है लेकिन इस बीच मौसम ने करवट ली तो किसानों ने लाह लेकर फसलों कटाई शुरू कर दी है। बदले मौसम के मिजाज से जीरा, ईसबगोल, सरसो सहित सब्जियों की फसल में नुकसान होने की आशंका है। वहीं इसे लेकर किसान भी अब आधी अधूरी पकी फसल को काटनी शुरू कर दी है। किसानों की ओर से अपने स्तर बड़ी मात्रा में रबी की सिंचाई की हुई होने एवं बादल छाने के बाद डर से किसान अब समूह में फसलों की कटाई शुरू कर रहे हैं। जिससे एक साथ बड़ी मात्रा में खड़ी फसल कट सके।असल में बरसात की भरी भरकम बारिश बन जाती है फसलों की बैरन बुँदे फसलों को चौपट कर देती है। हालाँकि जीरे की फसल को भी ज्यादा नुकसान होता है लेकिन जीरे की फसल की कटाई हो गई है और अब बाकी बचे इसबगोल पर बरसात का खतरा मंडरा रहा है। ईसबगोल फसल अब पकने की तैयारी में थी, लेकिन बादल छाने के बाद किसानों को खराब होने का डर सता रहा है जिससे कि सानों ने आधी पकी फसल काटनी शुरू कर एकत्रित कर रहे हैं।प्राकृतिक प्रकोप के कारणों को यहाँ संस्कृति में गीतों के रूप में गाया जाता है। बरसात से जीरे की फसल के ख़राब होने के अंदेशे से एक बीवी अपने पिया से कहती है ‘ओ जीरो जीवरो बैरी रे, मत ब्यावो म्हारा परनिया जीरो’ । इसके अलावा समूह में एक साथ फसल काटने की प्रथा को क्षेत्र में लाह कहते हैं। लाह के दौरान किसान अलग-अलग दिन एक-दूसरे के खेत में जाकर कटाई करते हैं। लाह के दौरान किसानों की ओर से फसल कटाई के साथ-साथ मारवाड़ी गानों को धुन के साथ गाया जाता है। जिसमें रामाइयों भण ले रे भाई… गीत जो प्रमुख होता है उससे कटाई कर रहे सभी किसान एक साथ ऊंची आवाज में गाते हैं। वहीं लाह के दौरान किसानों की भरपूर सेवा की जाती है। दोपहर शाम को किसानों को बाजरे की रोटी के साथ गुड़ घी डालकर चूरमा बनाकार खिलाते हैं।दिनेशसिंह दहिया किसान ओटवाला सायला का कहना है कि हालांकि कहीं-कहीं हल्की व बूंदाबांदी हो जाती है,लेकिन फसलों समय के पहले ही कटाई शुरू कि गई है  इससे किसानों के चेहरों पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। कमजोर मानसून के कारण जीरों की फसल पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं।

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