राजस्थान की भव्यता का प्रतीक जोधपुर शहर

Mar 25,2018, 23:03 PM

मदन शर्मा@ खुड़ियाला चामुंडा जोधपुर                    

 

 जोधपुर के पश्चिमी उत्तर दिशा में 30 किलोमीटर दूर है चावण्डा गाँव।  यहां पर राव की चौपाईयोँ ओर गांव के इतिहास अनुसार लांछा देवी पुरोहित पहाड़ी पर देवी माँ की  पूजा उपासना  करती थी। देवी ने प्रसन्न होकर  वरदान दिया था कि जब भी आप याद करोगे मैं हाजिर हो जाऊंगी। राव सीहा के वंशज वीरमदेव के पुत्र और प्रथम प्रतापी शासक  चुंडा जी राठौड़ बाड़ी की पहाड़ियों में यहाँ वहां घूम रहे थे।यहां पर जब एक कन्या को इस तरह चावण्डा पहाड़ी पर देवी के मंदिर में भक्ति करते हुए देखा। तो उन्होंने कहा की है वहीं मुझे यह बताओ कि मेरे जीवन में राजपाठ लिखा हुआ है।लाछा बाई ने कहा कि मैं आपके बारे में माता जी से बात करूंगी। लाछा बाई ने मां भवानी की अराधना कर पूछा मां एक राठौड़ कुल का नौजवान यहां भटक रहा है ।चामुंडा देवी ने कहां की है बेटी चुंडा जी राठौड़ का राज सुख लिखा हुआ है। जैसा मैं कहूंगा वैसा करोगी तो राजपाट भी होगा। उसी कथन के अनुसार राव चुंडा जी ने किया जिन्होंने मंडोर दुर्ग को मांडू के सूबेदार से जीतकर अपनी राजधानी बनाया था।चुंडा जी राठौड़ ने राजा बनने के बाद NASA भाई को 4 गांव की हर पक्ष को और चारगांव ससुराल पक्ष को जागीरी के रूप में  जिनमें से यह चामुंडा गांव भी हैं जहां के पांचलोड तेजाजी के साथ लाछो बाई का विवाह हुआ। आज चावण्डा गांव के राजपुरोहित मां चामुण्डा के कारण चावण्डिया कहलाने लगे जोधा जी ने जब जोधपुर नगर बसाया तो अपनी कुलदेवी मां चामुंडा जी का मंदिर मेहरानगढ़ दुर्ग में स्थापित किया। जो  जिले  आज विश्व विख्यात है।

 

राजस्थान की भव्यता का प्रतीक जोधपुर शहर अपनी बेमिसाल हवेलियों की भवन निर्माण कला,मूर्ति कला तथा वास्तु शैली के लिए दूर-दूर तक विख्यात है। इसी शहर के लगभग 400 फुट ऊंचे शैल के पठार पर स्थित है, भारत के सबसे विशाल किलों में से एक मेहरानगढ़ का भव्य किला।

 

किले की छत पर विराजमान यह मंदिर अपनी मूर्ति कला तथा उत्तम भवन निर्माण कला की एक अनूठी मिसाल है, जहां से सारे शहर का विहंगम दृश्य साफ नजर आता है। मेहरानगढ़ किले में प्रवेश मार्ग से सूर्य की आभा का आभास देते श्री चामुंडा देवी मंदिर में प्रवेश करने का मार्ग आसपास बनी आकर्षक मूर्तियों से सुसज्जित है। मंदिर में स्थापित मां भवानी की मूर्ति मगन बैठी मुद्रा की बजाय चलने की मुद्रा में नजर आती है। मां चामुंडा देवी को अब से करीब 550 साल पहले मंडोर के परिहारों की कुल देवी के रूप में पूजा जाता था |इस किले में एक भव्यता का प्रतीक मां जगदम्बा चामुंडा का मंदिर भी स्थित है, जो किले के दक्षिणी भाग में सबसे ऊंची प्राचीर पर स्थित है। श्री चामुंडा देवी का यह मंदिर जोधपुर राज परिवार का इष्ट देवी मंदिर तो है ही, बल्कि लगभग सारा जोधपुर ही इस मंदिर की देवी को अपनी इष्ट अथवा कुल देवी मानता है।

इतिहास

इस मंदिर में देवी की मूर्ति 1460 ई. में चामुंडा देवी के एक परमभक्त मंडोर के तत्कालीन राजपूत शासक राव चुंडा के पुत्र राव जोधा द्वारा अपनी नवनिर्मित राजधानी जोधपुर में बनाए गए किले में ही स्थापित की गई। पहले मां चामुंडा को जोधपुर और आस-पास के लोग ही मानते थे और इनकी पूजा अर्चना किया करते थे | लेकिन मां चामुंडा में लोगों का विश्वास 1965 के युद्ध के बाद बढ़ता चला गया |

लोगों की आस्था बढ़ने के पीछे की वजह के बारे में कहा जाता है कि जब 1965 का युद्ध हुआ था, तब सबसे पहले जोधपुर को टारगेट बनाया गया था और मां चामुंडा ने चील के रूप में प्रकट होकर जोधपुरवासियों की जान बचाई थी और किसी भी तरह का कोई नुकसान जोधपुर को नहीं होने दिया था | तब से जोधपुर वासियों में मां चामुंडा के प्रति अटूट विश्वास है |

मंदिर के पुजारी ने कहा कि मां चामुंडा का परचम इतना लहराया है कि आज जोधपुर से बाहर शायद ही कोई ऐसा गांव या शहर ऐसा होगा, जहां मां चामुंडा को लोग नहीं मानते और जानते हों | इसी वजह से देश और विदेश की जानी मानी हस्तियां जोधपुर में आकर अपने मांगलिक कार्य पूरे करते है 

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