देखते है किसको मिलेगी चुनावी टिकट,कई राजनेताओं का बिगड़ेगा गणित

Oct 08,2018, 11:10 AM

सुरेश जैन@बीकानेर। विधानसभा चुनाव की आचार संहिता चुनाव लडऩे के लिए आतुर राजनेताओं को लिए रेस की सीटी साबित हो गई है। प्रदेश की दूसरी विधानसभाओं की तर्ज पर बीकानेर जिले की सात विधानसभाओं में भी दावेदारों की कमी भी नहीं है। हर एक विधानसभा सीट के लिए हर पार्टी के पास दस-दस दावेदार हैं, लेकिन तीन-चार ऐसे चेहरे हैं जिन्हें गंभीर कहा जा सकता है। "DPKNEWS" ने विधानसभा ऐसे ही चेहरों को खोजने का प्रयास किए है। कांग्र्रेस और भाजपा, दोनों ही राजनीतिक पार्टियों से दावेदारी कर रहे, इन चेहरों में से ही किसी एक का सेनापति बनना तय है। प्रस्तुत है बीकानेर विधानसभा पश्चिम की ग्राउंड रिपोर्ट।

बीकानेर विधानसभा (पश्चिम) :हार की हैट्रिक या जीत की-बीकानेर विधानसभा पश्चिम में इस बार भारतीय जनता पार्टी को अपनी जीत बनाए रखने की चुनौती है। अगर ऐसा करने में भाजपा सक्षम रहती है तो यह उसकी जीत की हैट्रिक होगी और इस रूप में यह कांग्रेस की हार की भी हैट्रिक हो जाएगी, लेकिन कांग्रेस को इस बार एंटी-इनकॉम्बेंसी के साथ सहानुभूति, संभावना का लाभ मिल सकता है। दोनों ही पार्टियों को जीत के लिए व्यक्ति के साथ-साथ जिताऊ-फैक्टर पर भी काम करना पड़ेगा। लगातार हारने के बाद यह सीट कांग्रेस के लिए संकट की है तो भाजपा के पक्ष में जातीय समीकरण हैं। इस सीट में दोनों ही पार्टियों के सामने पुष्करणा ब्राह्मण समाज के प्रत्याशी को टिकट देने की विवशता है। इस विधानसभा में पुष्करणा और वैश्य मतदाता निर्णायक बनेगा। ऐसा माना जाता है कि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने वैश्य समाज की मांग के बावजूद पूर्व विधानसभा का टिकट वल्लभ कोचर को नहीं दिया, जिसका असर पश्चिम पर पड़ा। इस बार पश्चिम से नगर विकास न्यास अध्यक्ष महावीर रांका की भी दावेदारी है, देखना होगा कि क्या भाजपा इस तरह का रिस्क लेगी। मोटे तौर पर मुख्यमंत्री वसुंधराराजे की गौरव यात्रा के दौरान पश्चिम के विधायक डॉ.गोपाल जोशी को राजे ने अपनी गाड़ी में बिठाकर एक संकेत दिया है, लेकिन भाजपा के दावेदारों में शहर भाजपा अध्यक्ष सत्यप्रकाश आचार्य, पूर्व अध्यक्ष विजय आचार्य, भाजपा आईटी सेल के प्रदेश संयोजक अविनाश जोशी, आरएसएस से जेठानंद व्यास रेस में बने हैं, दूसरी ओर देवीसिंह भाटी गुट से भाजपा के पूर्व अध्यक्ष रामकिसन आचार्य की दावेदारी भी मजबूत मानी जा रही है, लेकिन राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि टिकट की नब्बे फीसदी संभावना डॉ.गोपाल जोशी की है। उनके अलावा पांच फीसदी उनके परिवार विजय मोहन जोशी, गोकुल जोशी और बचे हुए पांच प्रतिशत में दूसरे दावेदार रहेंगे।

इसी तरह कांग्रेस में भी डॉ.बी.डी.कल्ला का कोई विकल्प नजर नहीं आ रहा है। हालांकि तनवीर मालावत, डॉ.राजू व्यास, राजकुमार किराड़ू, गुलाम मुस्तफा, आनंद जोशी ने ताल ठोक रखी है और कल्ला की परेशानी के सबब भी बने हुए हैं। अगर दो बार चुनाव हारे हुए को टिकट नहीं देने वाला राहुल-फार्मूला यहां लागू हो जाता है तो इन दावेदारों में से किसी का भाग्य खुल सकता है और ऐन मौके पर डॉ.कल्ला अपने परिवार से भी किसी का नाम आगे कर सकते हैं।

बीकानेर विधानसभा (पूर्व) : कमजोर परफोर्मेंस ने खड़े किए दावेदार-बीकानेर विधानसभा पूर्व में पहले चालीस और फिर तीस हजार वोटों से पीछे रही कांग्रेस के लिए यह सीट संकट की है। स्वाभाविक रूप से इस सीट पर प्रदेश कार्यसमिति सदस्य गोपाल गहलोत, शहर अध्यक्ष यशपाल गहलोत, वल्लभ कोचर, डॉ. सुभाष गोस्वामी, अरविंद मिढा, नरेंद्रसिंह, कर्नल शिशुपाल सिंह, चांद गहलोत, संजय आचार्य इस सीट पर कांग्रेस के दावेदार हैं तो दूसरी भले ही भाजपा में सिद्धि कुमारी की टिकट नहीं कटने का कोई कारण नहीं है, फिर भी मोहन सुराणा, सुरेंद्रसिंह शेखावत, चेतन राजपुरोहित, दिलीप पुरी आदि दावेदार सामने आए हैं। इस बार भी पिछली बार की तरह वसुंधराराजे के इस सीट से चुनाव लडऩे की सुगबुगाहट है।

सिद्धि कुमारी की निष्क्रियता के चलते हालांकि वे अपनी एक अच्छी परफोर्मर साबित नहीं हो सकीं, लेकिन उनसे पूर्व के मतदाताओं को शिकायत भी नहीं है, लेकिन कहीं न कहीं इस बार महल की बजाय मठों की मनुहार भी चल रही है।

कांग्रेस के तीस हजार के फासले को पार करने की चुनौती तो रहेगी ही। ऐसे में यहां से कांग्रेस किसी ब्राह्मण चेहरे को उतारने की भी सोच सकती है। इस रूप में शशिकांत शर्मा का नाम सबसे ऊपर उभर कर आ रहा है, क्योंकि वे इस विधानसभा में रहने वाले गैर-पुष्करणा ब्राह्मण वर्ग से आते हैं

कोलायत विधानसभा : जीते कोई, बना रहेगा भाटी-वर्चस्व- कोलायत विधानसभा के परिणाम पिछली बार जबर्दस्त उलटफेर के शिकार हुए और उसके बाद पूर्व मंत्री देवीसिंह भाटी के चुनाव नहीं लडऩे संबंधी बयानों ने भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अगर भाटी अपनी बयानों पर अडिग भी रहते हैं तो यह तय है कि उनकी सिफारिश पर ही टिकट दिया जाएगा। ऐसे में टिकट के स्वाभाविक दावेदार पूर्व सांसद महेंद्रसिंह भाटी की धर्मपत्नी, पुत्र अंशुमान और कोलायत प्रधान जयवीर को माना जा रहा है।

लेकिन यह तब होगा जब अंतिम रूप से देवीसिंह भाटी चुनाव नहीं लडऩे के फैसले पर अडिग रहेंगे। मुख्यमंत्री की गौरव यात्रा के दौरान उनका शक्ति-प्रदर्शन इस बात को तो साबित करता है कि वे भले ही चुनावों की राजनीति से दूरी बना लें, लेकिन सक्रिय राजनीति में रहेंगे। गौर से देखा जाए तो सक्रिय राजनीति और चुनावी राजनीति में कोई भेद नहीं है। हर बार की तरह यह सीट हॉट-सीट रहेगी, क्योंकि इस सीट पर कांग्रेस भंवरसिंह भाटी के अलावा किसी भी नाम पर समझौता नहीं करने वाली है। पिछली बार मोदी लहर के बावजूद बीकानेर जिले की नोखा सीट से जीतने वाले रामेश्वर डूडी और कोलायत से भंवरसिंह भाटी ही थे, जिन्होंने प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चर्चा प्राप्त की थी। देवीसिंह भाटी के वर्चस्व को तोडऩे वाले भंवरसिंह भाटी के पास जीत को दोहराना बड़ी चुनौती होगी, लेकिन इतना साफ है कि इस सीट पर जीते कोई भी, वर्चस्व भाटियों का ही रहेगा।

खाजूवाला विधानसभा : अर्जुन-रामेश्वर की पसंद-नापसंद रहेगी महत्वपूर्ण- खाजूवाला विधानसभा से डॉ.विश्वनाथ जीतकर संसदीय सचिव बने, लेकिन इस बार उन्हें अपनी ही पार्टी से दूसरा दावेदार मिल सकता है। बीकानेर सांसद और इस बार की चुनाव संचालन समिति में महती भूमिका निभाने वाले अर्जुनराम मेघवाल का इस सीट पर प्रभाव टिकट वितरण के समय देखा जा सकता है। दोनों के बीच संबंध ज्यादा मधुर नहीं होने और अर्जुनराम मेघवाल के बेटे रविशेखर की यहां से दावेदारी होने के कारण विश्वनाथ के लिए यह दौर चुनौती पूर्ण रहेगा। संघ के चहेते भोजराज मेघवाल भी दावेदार है। दूसरी ओर कांग्रेस में भी यहां से प्रत्याशी नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी की पसंद का होना है। यही एक वजह है गोविंद मेघवाल को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। गोविंद के अलावा टिकट के दावेदारों में सुषमा बारूपाल, मदन मेघवाल, सांगीलाल वर्मा, अंबाराम इणखिया भी शामिल हो चुके हैं। इस सीट पर डूडी और मेघवाल फैक्टर ही परिणामों की दिशा तय करेंगे।

लूणकरणसर : सुराना के वोट-बैंक में सेंध लगाना चुनौती- कांग्रेस और भाजपा एक बार फिर यहां से जाट प्रत्याशी देने के मूड में हैं और इन स्थितियों को भांपते हुए मानिकचंद सुराना अपने निश्चय पर अटल लग रहे हैं। परिवर्तन सिर्फ इतना हुआ है कि इस बार उनके स्थान पर पौत्र सिद्धार्थ मैदान में है। एक बार सुराना ने पौत्र को प्रेक्टिकली मैदान की हकीकत भी समझा दी है। मतलब साफ है कि अगर सुराना को भाजपा टिकट नहीं देती है तो निर्दलीय ताल ठोकेंगे।भाजपा के दावेदारों के रूप में स्वाभाविक रूप से सुमित गोदारा हैं तो सहीराम दुसाद, महेश मूण्ड की भी जाट प्रत्याशी के नाते दावेदारी कमजोर नहीं है। दुसाद पर सीआर चौधरी का वरदहस्त निर्णयों में उलटफेर भी करवा सकता है। इस बीच भाजपा में गैर जाट प्रत्याशी की संभावना लिए प्रभुदयाल सारस्वत पूरी ताकत झोंके हुए है। लूणकरणसर में पिछले चुनाव में ब्राह्मण प्रत्याशी के रूप में चंपालाल ओझा के 37000 वोट और इससे पहले सामाजिक न्याय मंच से डॉ.गोपाल कृष्ण जोशी की दावेदारी से ब्राह्मण प्रत्याशी प्रभुदयाल उत्साह में हैं।

दूसरी ओर, वीरेंद्र बेनीवाल की राह में अगर डूडी का गतिरोध नहीं हो तो वे स्वाभाविक प्रत्याशी हैं। टिकट के वितरण में डूडी की पसंद-नापसंद हावी रहती है तो वीरेंद्र बेनीवाल को अपनी दावेदारी सिद्ध करने के लिए मशक्कत करनी पड़ेगी। इसे देखते हुए यूथ कांग्रेस से आने वाले राजेंद्र मूंड, जिला प्रमुख सुशीला सींवर, रायसिंह गोदारा दावेदार हैं। कुल मिलाकर यह सीट अभी से त्रिकोणीय मुकाबले की रोचक सीट बनती दिख रही है। दोनों बड़ी पार्टियों को जीतने के लिए सुराना के वोट बैंक में सेंध लगानी होगी।

नोखा विधानसभा : इस बार भी हो सकता है कुछ अनोखा- मोदी लहर में नोखा ने अनोखा परिणाम दिया और रामेश्वर डूडी को 30,000 मतों से आगे रखते हुए भाजपा के सहीराम को पांच हजार मतों पर समेट दिया। कन्हैयालाल झंवर का फैक्टर भी यहां काम करेगा तो रामेश्वर डूडी, जो देखते ही देखते राजस्थान के जाट नेता के रूप में पहचान बना रहे हैं, डूडी के लिए यहां जीत को दोहराना बड़ी चुनौती होगी। बागी होने के बाद बिहारीलाल की भाजपा में वापसी हो चुकी है। एसे में झंवर की नजर जाट-बिश्नोई मतदाता के बीच भाजपा-कांग्रेस के रूप में वोटों का विभाजन होने के बाद बचने वाले वोटों पर है, इसी के आधार पर वे चुनाव की वैतरणी पार करने का सपना संजोए है और इसी वजह से एक राष्ट्रीय दल से संपर्क में भी हैं। यहां त्रिकोणीय मुकाबला तय है। कुल मिलाकार कांग्रेस के लिए इस सीट को निकालना रामेश्वर डूडी के लिए बड़ी चुनौती है। भाजपा से नोखा प्रधान कन्हैयालाल भी दावेदारी कर रहे है।

श्रीडूंगरगढ़ विधानसभा : टिकटों की दौड़ के अलावा भी नजरों में- श्रीडूंगरगढ़ विधानसभा में भाजपा नया चेहरा देकर चौंका भी सकती है। इस सीट पर बढ़ता हुआ संघ का दखल भाजपा के नेताओं के लिए भी परेशानी का सबब बन रहा है। वर्तमान विधायक किसनाराम नाई की उम्र को देखते हुए उनका टिकट कटना तय मान लिए जाने के साथ ही भाजपा में रामगोपाल सुथार, तोलाराम जाखड़, कोडाराम भादू, शिव स्वामी आदि सक्रिय हो चुके हैं। दूसरी ओर कांग्रेस में मंगलाराम की दावेदारी भी संकट में है। मंगलाराम की अशोक गहलोत गुट से नजदीकियां हैं, यही उनके लिए माइनस है। यहां रामेश्वर डूडी खेमा सक्रिय हो चुका है और प्रभावी होता जा रहा है। जिला परिषद सदस्य हरिराम बाना कांग्रेस में दावेदार के रूप में उभर रहे हैं।इन सभी के बीच यह भी तय है कि अपनी अनदेखी होने की स्थिति किसनाराम बर्दाश्त नहीं कर पाएं और वे निर्दलीय ताल ठोकने के लिए किसी का नाम आगे कर दें।

कुल मिलाकार बीकानेर जिले की इन विधानसभाओं में जहां कांग्रेस के सामने नंबर बढ़ाने की चुनौती है, उसे दो से ज्यादा के लिए काम करना पड़ेगा। कोलायत में हार का हिसाब चुकता करने के लिए देवीसिंह भाटी पूरा जोर लगाएंगे। नोखा में कन्हैयालाला झंवर डूडी के वर्चस्व को चुनौती देंगे। निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मानिकचंद सुराना का पिछली बार जीत जाना दोनों की पार्टियों के शर्म की बात बन गया था, देखते हैं इस बार सिद्धार्थ के लिए दोनों पार्टियां क्या रणनीति अपनाएगी। भाजपा के पास बीकानेर विधानसभा पूर्व और पश्चिम के अलावा श्रीडूंगरगढ़ और खाजूवाला रही है, इन चारों सीटों पर दबदबा बनाए रखना मतदाताओं के मन को समझे बगैर संभव नहीं होगा।

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