एग्जिट पोल क्या होते हैं,  ये कैसे कराये जाते हैं, एग्जिट पोल के लिए भारत में कानून क्या है ? देखिये

Dec 09,2018, 14:12 PM

आप देखते होंगे की किसी भी राज्य में सभी चरणों के मतदान खत्म होते ही अलग अलग टीवी चैनल्स पर एग्जिट पोल आने लगते हैं। इन एग्जिट पोल्स में मतदाताओं के रुझान पेश किए जाते हैं। जिसके माधयम से किसी पार्टी विशेष के जीतने की भाविष्यवाणी की जाती है।लेकिन ये एग्जिट पोल हमेशा अपने आंकड़ों पर खरे नहीं उतरते हैं। कभी कभी तो इनके आंकड़े में जमीन आसमान तक का अंतर हो जाता है, जिसके कारण एग्जिट पोल की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े होने लगते हैं। 

आज हम आपको इसी एग्जिट के सभी पहलुओं से रूबरू कराएँगे - जिनमें की एग्जिट पोल क्या होते हैं,  ये कैसे कराये जाते हैं, एग्जिट पोल के लिए भारत में कानून क्या है और इसको लेकर क्या मत हैं।

 

दरअसल एग्जिट पोल मतदान देकर बहार निकल रहे लोगों से पूछे गए कुछ सवालों का एक सर्वेक्षण हैं। जिसके ज़रिये पार्टियों को मिले वोटो का अनुमान लगाया जाता है। एग्जिट पोल का मकसद आधिकारिक परिणाम घोषित होने से पहले ही चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी करना है, जिसका अधिकार भारतीय मीडिया को प्रेस की आज़ादी और अभिवयक्ति की स्वतंत्रता के तहत मिली हुई है ।भारत में कुछ एजेंसियां जैसे - सी वोटर, टूडेज चाणक्य , टाइम्स नाउ, CNN और IBN के अलावा कई संस्थाएं एग्जिट पोल का सर्वेक्षण करती हैं।ये संस्थाएं वोटिंग के दौरान ही अलग अलग उम्र, लिंग, जाति और समुदाय के लोगों से कुछ सवाल पूछ्ती  हैं जैस कि आपने किस पार्टी को वोट दिया, और क्यू ये एजेंसियां लगभग हर तीसरे या चौथे मतदाता से सवाल करतीं  हैं  ताकि सभी वर्ग के मतदाताओं का प्रयाप्त भागीदारी सर्वेक्षण में बनी रहे।  बाद में इन्ही मतदाताओं के जवाबों के अनुसार एजेंसियां अपना एग्जिट पोल तैयार करते हैं। जिसका सभी चरणों के चुनाव समाप्त हो जाने के बाद टीवी चैनल्स प्रसारण करते हैं।

भारत में एग्जिट पोल को लेकर कुछ विवाद भी हुए हैं, इन विवादों में एग्जिट पोल के आकंड़े के अनुसार हार रही पार्टियों ने इसे हमेशा से ही आधारहीन बताते हुए समाप्त करने की मांग की है। इससे पहले चुनाव आयोग भी एग्जिट पोल और ओपिनियन पोल पर प्रतिबन्ध लगाने की कोशिश करता आया है।ओपेनियन पोल और एग्जिट पोल दोनों अलग अलग टर्म्स है। एग्जिट पोल का मतलब जहां चुनाव के बाद किया गया सर्वेक्षण है तो वही ओपेनियन पोल की प्रक्रिया चुनाव के पहले ही करा ली जाती है।

चुनाव आयोग की मांगों को लेकर साल 1999 में सर्वोच्च न्यायलय ने एक दिशा निर्देश जारी किया था। इस निर्देश में सुप्रीम कोर्ट कहा था कि बिना किसी वैधानिक प्रतिबन्ध के चुनाव आयोग ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल पर कोई रोक नहीं लगा सकता है। जिसके बाद से ये दोनों ही पोल भारत में जारी हैं। हालांकि 2004 में चुनाव आयोग ने एक बार फिर एग्जिट पोल और ओपिनियन पोल के नियमों में कुछ बदलाव बात रखी। चुनाव आयोग ने ये मांग कानून मंत्री के सामने रिप्रजेंटेशन ऑफ़ द पीपल एक्ट में कुछ संशोधन कराने के लिहाज से रखी थी।  जिसमें ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल को चुनाव के एक निर्धारित समय के दौरान बैन करने की मांग की गयी थी।

फरवरी 2010 में ये फैसला आया तो ज़रूर लेकिन ये पूरी तरह से  चुनाव आयोग के पक्ष में नहीं था। कानून मंत्रालय ने रिप्रजेंटेशन ऑफ़ पीपल एक्ट के सेक्शन 126 A को  परिभाषित करते हुए सिर्फ एग्जिट पोल को ही एक समय विशेष के लिए प्रतिबंधित करने की बात कही। इस प्रतिबन्ध के अनुसार किसी भी राज्य में सभी चरणों के मतदान पूरा हो जाने के आधे घंटे बाद ही एग्जिट पोल के नतीजों को प्रसारित करने का आदेश है।एग्जिट पोल और ओपेनियन पोल को लेकर अलग अलग देशों में अपने अपने  कानून हैं। अमेरिका में ओपेनियन पोल को अभिव्यक्ति की आज़ादी का अभिन हिस्सा बताया गया हैं जहां इसे कभी भी प्रसारित किया जा सकता है।  जबकि एग्जिट पोल को लेकर वहां भी भारत जैसे ही कानून हैं।

 

आइये अब जानते हैं कि एग्जिट पोल को लेकर लोगों के क्या मत हैं और आगे क्या होना चाहिए।

एग्जिट पोल को लेकर जो विवाद होते हैं उसमें कहा जाता है कि एग्जिट पोल के कारण दुसरे मतदाताओं के व्यव्हार और सोचने की दिशा प्रभावित होती है जिसके कारण वो खुद का तर्कसंगत विचार नहीं रख पाते हैं।एग्जिट पोल के आने के बाद राजनैतिक पार्टियां पहले ही जश्न मनाने लगती हैं, जबकि कई बार  एग्जिट पोल के आंकड़े गलत साबित होते हैं जिससे चुनावी अव्यस्था पैदा होने का खतरा रहता है।एग्जिट पोल के दौरान ये भी सम्भावना रहती है कि राजनैतिक पार्टियों के साथ भेदभाव किया जा सकता है जिसका चुनाव प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।इसके अलावा किसी मतदाता के मतदान  को सार्वर्जनिक करना भी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के खिलाफ है जिससे पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं। 

 

बकि एग्जिट पोल के पक्ष में लोगो का तर्क ये है कि

 

एग्जिट पोल को बैन करने से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ माने जाने वाले प्रेस की स्वतंत्रता के साथ साथ ये नागरिकों की भी अभिव्यक्ति पर पाबंधी लगाने जैसा है।  इसके अलावा ये पोल इस बात का भी इशारा करते हैं की मतदान के बहुमत का झुकाव किस राजनीतिक दाल का ओर ज़्यादा है।  जिससे उस पार्टी के चुनावी विश्वसनीयता का मूल्यांकन किया जा सके। हालाँकि एग्जिट पोल को तभी सही ठहराया जा सकता है जब तक कि उसके काम पर कोई सवाल न उठे।  निर्वाचन आयोग को चाहिए कि  एग्जिट पोल के लिए काम करने वाली एजेंसियों के लिए के लिए कुछ नियम तैयार किए जाय। जिससे की निष्पक्ष और सटीक आंकड़ों का पता लगाया जा सके।एग्जिट पोल के लिए जितने ज़्यदा आयु वर्ग और जातिसमुदाय के लोगों पर सर्वेक्षण किया जायेगा नतीजे उतने ही बेहतर आएंगे।स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन की भावना को बनाये रखने के लिए  नागरिकों  और मीडिया संगठनों को भी चाहिए जिम्मेदारी पूर्ण व्यहार अपनाये। इसके आलावा एग्जिट पोल के परिणामों को लेकर भी लोगों में जागरूकता फैलाई जाय। जोकि चुनाव प्रक्रिया के लिए एक बेहतर कदम साबित होगा।

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