जीत के बावजूद कांग्रेस के पैरों तले जमीन खिसक रही है.....देखिये क्या है 

Dec 13,2018, 13:12 PM

जयपुर : राजस्थान के सियासी जमीन पर कांग्रेस जीत हासिल करते हुए भाजपा को सत्ता से बेदखल करने में कामयाब तो हो गई है. लेकिन, उसके अपने पैरों तले से भी जमीन खिसकती दिखाई दे रही है. जो कि पार्टी के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है. पिछले चार चुनाव के नतीजों को देखें तो कांग्रेस के जनाधार का दायरा लगातार सिमटता जा रहा है. उसके इस दायरे में हर चुनाव में सेंध लगती जा रही है. इस बार चुनाव की आहट के साथ ही कांग्रेस के पक्ष में हर  समीकरण शरुआत से ही बने हुए थे. चुनावी घमासान से पहले ही साफ संकेत था कि कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है. इसके पीछे सबसे बड़ा आधार भाजपा सरकार के खिलाफ राज्य में बने एंटी इंकंबेसी के साथ ही वसुंधरा राजे की कार्यशैली रही है. सरकार के खिलाफ राज्य में बनी नाराजगी के बीच कांग्रेस को भी पूरा विश्वास बना रहा कि वे सत्ता में लौट रहे हैं. ऐसा हुआ भी, लेकिन जिस तरीके कांग्रेस को जीत मिली है. उसने कई :सवाल खड़े कर दिए हैं. जहां पहले यह अंदाजा लगाया जा रहा था कि भाजपा का सूपड़ा साफ हो जाएगा. परिणाम ठीक इसके उलट आए हैं. सरकार के प्रति लोगों में जबरदस्त नाराजगी के बाद भी कांग्रेस महज 99 सीटों पर जीत हासिल कर सकी. साथ ही बहुमत के लिए जरूरी 100 के आकड़े को पार्टी ने सहयोगी दल आरएलडी की एक सीट के साथ छुआ है. इसके बाद कांग्रेस सरकार बनाने की कवायद में जुटी है. लेकिन, इन सबके बीच ये सवाल अहम हो गया है कि आखिर भाजपा के खिलाफ तैयार वोट की फसल को काटने से कांग्रेस चूक कैसे गई. क्योंकि, भाजपा को इस चुनाव में मिली 73 सीटों को राजनीतिक रूप से सम्मानजनक रूप से देखा जा रहा है. वहीं, इस चुनाव में दोनों प्रमुख पार्टियों के वोट शेयर को देखें तो कांग्रेस ने भाजपा की तुलना में महज 0.5 प्रतिशत अधिक मत प्राप्त किया है. जो कि साफ संकेत देती है कि भाजपा के प्रति जबरदस्त नाराजगी के बाद भी कांग्रेस जीत के बीच अपनी जमीन को मजबूत करने में नाकाम रही है. इस चुनाव में कांग्रेस को जहां कांग्रेस को 39.3 प्रतिशत वोट मिले हैं. जबकि, भाजपा के पक्ष में 38.8 प्रतिशत वोट पड़े हैं. जानकारों का कहना है कि वोट शेयर की ये स्थिति कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात बन गई है. क्योंकि, इससे पहले चार चुनावों पर नजर डालें तो यह देखने को मिलता है कि इस बार जो वोट शेयर कांग्रेस को मिला है. उससे केवल पार्टी ने अपनी जमीनी स्थिति को थोड़ा संभाल ही सकी है. आपको बता दें कि 1998 के बाद से अब तक हुए चुनाव में कांग्रेस के वोट शेयर में केवल गिरावट ही दर्ज की गई है. वोट शेयर में गिरावट का सबसे बड़ा  कारण संगठन के लिहाज से कांग्रेस का कमजोर होना ही है. 1998 के चुनाव में कांग्रेस ने 153 सीटें हासिल की थी. वहीं, इस बार पार्टी का वोट शेयर भी बढ़कर 44.95 पहुंच गया था. लेकिन, इसके बाद जो भी चुनाव हुए हैं, उसमें कांग्रेस के जनाधार  का दायरा सिमटता जा रहा है. 2003 में कांग्रेस को 39.20 प्रतिशत मिले जबकि 2008 में पार्टी का वोट प्रतिशत घटकर 34.27 पर पहुंच गया था. जबकि, इस साल अशोक गहलोत ने सियासी जोड़-तोड़ से कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया था.पांच साल सत्ता में रहने के बाद 2013 के चुनाव में मोदी लहर के दौरान पार्टी का वोट शेयर 33.07 प्रतिशत पर पहुंच गया. ऐसे में इस बार जब पार्टी का वोट शेयर 39.3 प्रतिशत पर पहुंचा है तो जानकार इसे पार्टी को पिछले चुनाव में हुए जमीनी नुकसान की थोड़ी बहुत भरपाई के तौर पर ही देख रहे हैं. क्योंकि, राज्य में पार्टी के पक्ष में माहौल होने के बाद भी संगठन के स्तर पर जमीनी पकड़ को ज्यादा मजबूत नहीं बना पाई. जानकारों का कहना है कि इस बार भाजपा की तुलना में मिली मामुली बढ़त को देखें तो साफ पता चलता है कि संगठन के लिहाज से कमजोर होने के कारण कांग्रेस के पैरों तले से जमीन खिसकती जा रही है. इस बार के चुनाव को देखें तो संगठन के रूप में कमजोर होने के कारण पार्टी केवल एक दायरे तक ही सरकार के प्रति बने लोगों के गुस्से को वोट के रूप में बदलने में कामयाब रही है. ये भी वो वोट थे, जो कि कांग्रेस के पाले में आसानी से चले गए. जबकि,  पूरे राज्य में फैले गुस्से को वोट के रूप में बदल पाने में कांग्रेस सफल नहीं रही है. माना जा रहा है कि कांग्रेस की ओर से  जमीनी स्तर पर वोट के बड़े  हिस्से को अपनी तरफ नहीं कर पाने के चलते, यहां तीसरे विकल्प के रूप में क्षेत्रीय दल और निर्दलीय प्रत्याशियों को मौका मिल गया. यही वजह है कि सरकार के खिलाफ फैले गुस्से को ये छोटे दल और निर्दलीय अपने वोट के रूप में बदलते हुए अन्य के खाते में 26 सीटें लेकर चले गए. जबकि, आसान टार्गेट होने के बाद भी कांग्रेस वोट की फसल को नहीं काट पाई. आपको बता दें कि कांग्रेस में संगठनात्मक कमजोरी पूरे चुनाव के दौरान देखने को मिला है. चुनाव प्रबंधन के लिए पार्टी के स्तर पर बनी 9 कमेटियों में से 8 कमेटियों के चेयरमैन और को-चेयरमैन भी इस बार मैदान में थे.  इनमें पार्टी के वे दिग्गज नेता भी शामिल रहे, जिनके कंधे पर चुनाव प्रबंधन के साथ ही जमीनी स्तर पर अधिक से अधिक वोट  को पार्टी की तरफ खींचने की जिम्मेदारी  थी. जानकारों का कहना है कि संगठनात्मक रूप से कमजोर होने के कारण वोट शेयर में तीसरे विकल्प ने जमकर सेंध लगाई है. निर्दलीयों सहित सभी क्षेत्रीय दलों को मिलाकर 21 प्रतिशत वोट इस बार तीसरे विकल्प के पास गया है. माना जा रहा है कि जमीनी स्तर पर अगर कांग्रेस के संगठन की स्थिति मजबूत होती तो आज जो परिणाम दिख रहे हैं, वो कुछ ओर ही होते.

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