सबसे खतरनाक मीडिया के लिए देशों की लिस्ट में चौथे नंबर पर रहा भारत

Dec 22,2018, 10:12 AM

साल 2018 में पत्रकारों या मीडियाकर्मियों के लिए जो देश सबसे खतरनाक साबित हुए हैं, उस सूची में भारत संयुक्त रूप से चौथे नंबर पर रहा है. दुनिया में इस साल 80 मीडियाकर्मियों को मौत के घाट उतारा गया है. सबसे ज़्यादा 15 मीडियाकर्मी अफगानिस्तान में मारे गए हैं. जारी आंकड़ों के हिसाब से मध्य पूर्व के वो देश, जहां सशस्त्र संघर्ष के हालात हैं, वहां मीडियाकर्मियों के लिए खतरा ज़्यादा रहा लेकिन हैरत यह है कि भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे स्थान भी इस सूची में हैं, जहां ऐसे किसी संघर्ष के हालात नहीं रहे अफगानिस्तान के बाद सीरिया दूसरे नंबर पर है, जहां इस साल 11 पत्रकारों की हत्या हुई. मेक्सिको में 9 और यमन में 8 मीडियाकर्मी इस साल मारे गए. इसके बाद इस सूची में यूएसए व भारत हैं, जहां 6-6 मीडियाकर्मियों की हत्या हुई है. बीते दो अक्टूबर को इस्तांबुल में जमाल खशोगी की हत्या के बाद से ही पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बढ़ रहे खतरे को लेकर बहस छिड़ी हुई है.  अफगानिस्तान के बाद सीरिया दूसरे नंबर पर है, जहां इस साल 11 पत्रकारों की हत्या हुई. मेक्सिको में 9 और यमन में 8 मीडियाकर्मी इस साल मारे गए. इसके बाद इस सूची में यूएसए व भारत हैं, जहां 6-6 मीडियाकर्मियों की हत्या हुई है. बीते दो अक्टूबर को इस्तांबुल में जमाल खशोगी की हत्या के बाद से ही पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बढ़ रहे खतरे को लेकर बहस छिड़ी हुई है. अफगानिस्तान के बाद सीरिया दूसरे नंबर पर है, जहां इस साल 11 पत्रकारों की हत्या हुई. मेक्सिको में 9 और यमन में 8 मीडियाकर्मी इस साल मारे गए. इसके बाद इस सूची में यूएसए व भारत हैं, जहां 6-6 मीडियाकर्मियों की हत्या हुई है. बीते दो अक्टूबर को इस्तांबुल में जमाल खशोगी की हत्या के बाद से ही पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बढ़ रहे खतरे को लेकर बहस छिड़ी हुई है. भारत में सबसे चर्चित हत्याकांडों में से एक रहा शुजात बुखारी हत्याकांड. कश्मीर में मीडिया जगत की हस्तियों में शुमार किए जाने वाले बुखारी को इस साल जून में मौत के घाट उतार दिया गया था. इसके अलावा मध्य प्रदेश के भिंड ज़िले में पत्रकार संदीप शर्मा की हत्या इसलिए कर दी गई थी क्योंकि वह रेत माफिया के खिलाफ पत्रकारिता कर रहे थे. इसी तरह, नवीन निश्चल, विजय सिंह और चंदन तिवारी की भी हत्या की गई. साथ ही, दूरदर्शन के मीडियाकर्मी अच्युतानंद नक्सली हमले में मारे गए.  भारत में सबसे चर्चित हत्याकांडों में से एक रहा शुजात बुखारी हत्याकांड. कश्मीर में मीडिया जगत की हस्तियों में शुमार किए जाने वाले बुखारी को इस साल जून में मौत के घाट उतार दिया गया था. इसके अलावा मध्य प्रदेश के भिंड ज़िले में पत्रकार संदीप शर्मा की हत्या इसलिए कर दी गई थी क्योंकि वह रेत माफिया के खिलाफ पत्रकारिता कर रहे थे. इसी तरह, नवीन निश्चल, विजय सिंह और चंदन तिवारी की भी हत्या की गई. साथ ही, दूरदर्शन के मीडियाकर्मी अच्युतानंद नक्सली हमले में मारे गए. भारत में सबसे चर्चित हत्याकांडों में से एक रहा शुजात बुखारी हत्याकांड. कश्मीर में मीडिया जगत की हस्तियों में शुमार किए जाने वाले बुखारी को इस साल जून में मौत के घाट उतार दिया गया था. इसके अलावा मध्य प्रदेश के भिंड ज़िले में पत्रकार संदीप शर्मा की हत्या इसलिए कर दी गई थी क्योंकि वह रेत माफिया के खिलाफ पत्रकारिता कर रहे थे. इसी तरह, नवीन निश्चल, विजय सिंह और चंदन तिवारी की भी हत्या की गई. साथ ही, दूरदर्शन के मीडियाकर्मी अच्युतानंद नक्सली हमले में मारे गए. खबरों से जुड़े काम करने के दौरान पत्रकारों की हत्याओं को लेकर जो आंकड़े जारी हुए हैं, उनके मुताबिक, मारे गए 80 मीडियाकर्मियों में से 63 प्रोफेशनल पत्रकार थे, जबकि 13 नॉन प्रोफेशनल. इनके अलावा इस साल 4 मीडियाकर्मी भी मारे गए जो सीधी पत्रकारिता से नहीं बल्कि मीडिया से जुड़े अन्य सहयोगी कामों से जुड़े थे.  खबरों से जुड़े काम करने के दौरान पत्रकारों की हत्याओं को लेकर जो आंकड़े जारी हुए हैं, उनके मुताबिक, मारे गए 80 मीडियाकर्मियों में से 63 प्रोफेशनल पत्रकार थे, जबकि 13 नॉन प्रोफेशनल. इनके अलावा इस साल 4 मीडियाकर्मी भी मारे गए जो सीधी पत्रकारिता से नहीं बल्कि मीडिया से जुड़े अन्य सहयोगी कामों से जुड़े थे. खबरों से जुड़े काम करने के दौरान पत्रकारों की हत्याओं को लेकर जो आंकड़े जारी हुए हैं, उनके मुताबिक, मारे गए 80 मीडियाकर्मियों में से 63 प्रोफेशनल पत्रकार थे, जबकि 13 नॉन प्रोफेशनल. इनके अलावा इस साल 4 मीडियाकर्मी भी मारे गए जो सीधी पत्रकारिता से नहीं बल्कि मीडिया से जुड़े अन्य सहयोगी कामों से जुड़े थे. आंकड़े बताते हैं कि इस साल मारे गए 80 मीडियाकर्मियों में से 49 को बाकायदा निशाना बनाकर कत्ल किया गया जबकि 31 मीडियाकर्मी हमलों में रिपोर्टिंग के दौरान तब मारे गए जबकि वे बतौर पत्रकार हमलावरों के निशाने पर नहीं थे. इस साल मारे गए मीडियाकर्मियों में 77 पुरुष जबकि 3 महिलाएं शामिल थीं.  आंकड़े बताते हैं कि इस साल मारे गए 80 मीडियाकर्मियों में से 49 को बाकायदा निशाना बनाकर कत्ल किया गया जबकि 31 मीडियाकर्मी हमलों में रिपोर्टिंग के दौरान तब मारे गए जबकि वे बतौर पत्रकार हमलावरों के निशाने पर नहीं थे. इस साल मारे गए मीडियाकर्मियों में 77 पुरुष जबकि 3 महिलाएं शामिल थीं. आंकड़े बताते हैं कि इस साल मारे गए 80 मीडियाकर्मियों में से 49 को बाकायदा निशाना बनाकर कत्ल किया गया जबकि 31 मीडियाकर्मी हमलों में रिपोर्टिंग के दौरान तब मारे गए जबकि वे बतौर पत्रकार हमलावरों के निशाने पर नहीं थे. इस साल मारे गए मीडियाकर्मियों में 77 पुरुष जबकि 3 महिलाएं शामिल थीं. मौतों के अलावा पत्रकारों के सामने और भी खतरे रहे यानी 348 मीडियाकर्मियों को इस साल पकड़ा गया जबकि 60 को बंधक बनाया गया. 3 पत्रकार इस साल लापता हुए हैं. इन तमाम आंकड़ों के बीच, यह बात उभरकर आई है कि हालात बदतर हुए हैं.  मौतों के अलावा पत्रकारों के सामने और भी खतरे रहे यानी 348 मीडियाकर्मियों को इस साल पकड़ा गया जबकि 60 को बंधक बनाया गया. 3 पत्रकार इस साल लापता हुए हैं. इन तमाम आंकड़ों के बीच, यह बात उभरकर आई है कि हालात बदतर हुए हैं. मौतों के अलावा पत्रकारों के सामने और भी खतरे रहे यानी 348 मीडियाकर्मियों को इस साल पकड़ा गया जबकि 60 को बंधक बनाया गया. 3 पत्रकार इस साल लापता हुए हैं. इन तमाम आंकड़ों के बीच, यह बात उभरकर आई है कि हालात बदतर हुए हैं. पिछले साल की तुलना में इस साल ज़्यादा मीडियाकर्मी मारे गए हैं. 2017 में 55 प्रोफेशनल पत्रकार मारे गए थे जबकि इस साल 63. इसी तरह पिछले साल सात गैर पेशेवर पत्रकारों की हत्या हुई थी जबकि इस साल 13 की. पिछले दस सालों में दुनिया भर में 700 से ज़्यादा मीडियाकर्मियों की हत्या हुई है. पिछले साल की तुलना में इस साल ज़्यादा मीडियाकर्मी मारे गए हैं. 2017 में 55 प्रोफेशनल पत्रकार मारे गए थे जबकि इस साल 63. इसी तरह पिछले साल सात गैर पेशेवर पत्रकारों की हत्या हुई थी जबकि इस साल 13 की. पिछले दस सालों में दुनिया भर में 700 से ज़्यादा मीडियाकर्मियों की हत्या हुई है.  पिछले साल की तुलना में इस साल ज़्यादा मीडियाकर्मी मारे गए हैं. 2017 में 55 प्रोफेशनल पत्रकार मारे गए थे जबकि इस साल 63. इसी तरह पिछले साल सात गैर पेशेवर पत्रकारों की हत्या हुई थी जबकि इस साल 13 की. पिछले दस सालों में दुनिया भर में 700 से ज़्यादा मीडियाकर्मियों की हत्या हुई है.

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